सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को विचाराधीन कैदियों पर एक महत्वपूर्ण फैसला दिया। कोर्ट ने कहा कि ऐसे विचाराधीन कैदी जो संबंधित मामले में दोषी पाए जाने पर मिलने वाली सजा की आधी अवधि जेल में बिता चुके हैं, उन्हें रिहा किया जाएगा।
कोर्ट ने कहा है कि जिन कैदियों ने अपनी आधी सजा जेल में काट ली है और उनकी सुनवाई अभी चल रही है, उन्हें रिहा कर देना चाहिए। कोर्ट का यह अहम फैसला उन मुकदमों पर लागू नहीं होगा जिनमें आरोपी को मौत की सजा अथवा उम्र कैद होने की संभावना रहती है। इस काम के लिए सर्वे की जिम्मेदारी जिला जज और एसडीएम को सौंपी गई है।
सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति आर.एम. लोढ़ा की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा कि कई जिलों के न्यायिक अधिकारी हफ्ते में एक बार अपने अधीनस्थ जेलों का दौरा कर ऐसे मामलों का पता लगाएंगे और इस तरह के विचाराधीन कैदियों को रिहा करने के आदेश देंगे।
कोर्ट ने कहा कि एक अक्टूबर से शुरू होने वाली इस प्रक्रिया में अगले दो महीने तक सेशन जज और उनके अधीनस्थ न्यायिक अधिकारी ऐसे मामलों की जांच के लिए और विचाराधीन कैदियों की रिहाई के आदेश देने के लिए अपने कार्य क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली जेलों का दौरा करेंगे।
देश की शीर्ष अदालत ने न्यायपालिका के लिए बजट आवंटन को लेकर केंद्र सरकार पर सवाल भी उठाया। कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह निचली अदालतों का बुनियादी ढांचा मजबूत करने के लिए और अधिक धनराशि आवंटित करे। कोर्ट ने कहा, 'अगर सरकार और अधिक जजों की नियुक्ति करती है तो उनकी मदद के लिए कोई ढांचा ही नहीं है।'
मामले की अगली तारीख 8 दिसंबर मुकर्रर करते हुए कोर्ट ने यह भी कहा कि दो महीने की प्रक्रिया पूरी हो जाने के बाद हाई कोर्ट्स के रजिस्ट्रार जनरल इस पूरी प्रक्रिया और विचाराधीन कैदियों से संबंधित रिपोर्ट सर्वोच्च न्यायालय के महासचिव को भेजेंगे।
एक अनुमान के मुताबिक, देश में 3.81 लाख कैदी हैं। इनमें से दो-तिहाई करीब 2.54 लाख विचाराधीन कैदी हैं, जिनके खिलाफ विभिन्न अदालतों में मामले चल रहे हैं। इनमें से कई कैदी ऐसे हैं जिन्हें जितने समय की सजा मिल सकती है, उसके आधा से ज्यादा वक्त वह पहले ही जेल में गुजार चुके हैं।
