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जीबी रोड पर टूटा तहखाना, दीवार ने 'उगली' लड़कियां

जीबी रोड पर टूटा तहखाना, दीवार ने 'उगली' लड़कियां
एक महीने पहले चलती बस में गैंगरेप की वारदात से शर्मसार हुई दिल्ली का एक और खौफनाक सच सामने आया है। दिल्ली के रेडलाइट इलाके जी बी रोड से 6 लड़कियों को एक ऐसे नर्क से आजाद कराया गया है जहां इंसान तो क्या, कोई जानवर भी नहीं रह सकता। जिस्म के सौदागरों ने तीन नाबालिग लड़कियों समेत छह
लड़कियों को यहां कैद कर रखा था। आरोप है कि बंगाल और कर्नाटक से लाई गईं इन लड़कियों से जबरन देह व्यापार कराया जाता था। एक एनजीओ की मदद से पुलिस ने मौके पर छापा मारा और सभी लड़कियों को छुड़ा लिया।
एक एनजीओ के जरिए पुलिस को खबर मिली थी कि यहां कोठरी नंबर 55 में एक खुफिया तहखाना है जहां लड़कियों को गुप अंधेरे में कैद कर रखा गया है। एनजीओ की मदद से मौके पर पहुंची पुलिस तहखाने को ढूंढने में लगी थी। लेकिन ये आसान नहीं था। जिस्म के सौदागरों ने तहखाने तक पहुंचने के रास्ते दीवारों में छिपा दिए थे। सुरंग जैसी जगह में प्लाई बोर्ड लगाकर दीवार की शक्ल दी गई थी। पुलिस ने हर दरवाजे को ठोंक कर देखा तो अंदाजा हुआ कि शायद इसके पीछे रास्ता हो सकता है। हुआ भी वही, प्लाई तोड़ने पर एक रास्ता नजर आया।
रास्ता जरूर मिला लेकिन वो तहखाना अब भी पहुंच से दूर था जहां लड़कियों को छिपाकर रखा गया था। करीब 12 मीटर लंबे गुफा नुमा रास्ते पर चलने के बाद पुलिस को एक के बाद एक छह एक जैसे दरवाजे मिले जो प्लाईबोर्ड के रूप में फिक्स थे। इन्हीं में से एक प्लाई बोर्ड पर पुलिस को शक हुआ और उसे जब तोड़ा तो सामने था वो नर्क जहां कैद थीं तीन लड़कियां। जिस जगह बमुश्किल एक या दो लोग सिर्फ झुककर खड़े हो सकते हैं, उतनी सी जगह में जानवरों की तरह कैद थीं ये लड़कियां। लेकिन अभी तो सिर्फ तीन लड़कियां मिली थीं, जबकि जानकारी मिली थी कि यहां कुल छह लड़कियां कैद हैं। पता चला कि इस छोटे से तहखाने के भी दो हिस्से किए गए हैं और दूसरे हिस्से में ही थीं बाकी की तीन लड़कियां।
जानकारी के मुताबिक बंगाल और कर्नाटक से लाई गईं इन लड़कियों में तीन नाबालिग हैं। पुलिस ने नर्क से आजाद कराई गईं सभी लड़कियों को महिला सुधार गृह भेज दिया है। मामले की तफ्तीश में जुटी पुलिस इस रैकेट से जुड़े तार जोड़ने में जुट गई है। लेकिन इस कार्रवाई को लेकर ये सवाल उठता है कि देश की सबसे तेज तर्रार पुलिस कही जाने वाली दिल्ली पुलिस को इसकी जानकारी एक एनजीओ से क्यों पता चलती है?