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दीपावली पर आत्मदीप जलाओ


धार्मिक इतिहास के अनुसार, दीपावली के पर्व को किसी ने श्रीराम के राज्याभिषेक के रूप में मनाया, तो किसी ने समुद्र-मंथन से लक्ष्मी जी को निकलता हुआ पाया। कभी नरकासुर के वध के रूप में, तो कभी महावीर स्वामी के निर्वाण का गवाह बना यह ज्योति-पर्व। पर आज यह पर्व मात्र वैभव की प्रतीक महालक्ष्मी के पूजन के रूप में समर्पित है। दीपावली पर सर्वत्र श्री लक्ष्मी के साथ श्री गणेश और मां सरस्वती का पूजन किया जाता है, क्योंकि मनुष्य को धन के साथ बुद्धि और सद्विवेक भी तो चाहिए। इस पर्व की हर परंपरा एक प्रतीक है। मिट्टी के बने साधारण दीपक में जब तेल और बाती डालकर उसे रोशन किया जाता है, तब वह पूजनीय बन जाता है। उसको नमस्कार किया जाता है और उसकी रोशनी को माथे से लगाया जाता है। उस जलते दीपक पर धन तथा पदार्थ वारी किए जाते हैं। उसे साक्षी मान प्रण किए जाते हैं। लेकिन दीपक के अंदर का तेल जब खत्म हो जाता है और उसकी बाती बुझ जाती है, तो उसी दीपक को कचरे में फेंक दिया जाता है। ठीक इसी तरह मानव शरीर भी मिट्टी के दीपक सदृश है, जब इस शरीर रूपी दीपक में आत्मा रूपी ज्योति प्रवेश होती है और जब ज्ञान रूपी घी से वह ज्योति निरंतर जगमगाती है, तब वह व्यक्ति पूजनीय बन जाता है। परंतु आत्मा के निकल जाते ही मानव शरीर की गति मिट्टी के दीपक समान हो जाती है।
अत: दीपावली है आत्मा की ज्योति, जिसे ज्ञान के घृत से प्रकाशित कर जीवन को पूजनीय बनाने का उपक्रम करना चाहिए। यदि आप इस वर्ष एक अनोखी दीपावली मनाना चाहते हैं, तो भले ही आप दीप जगमगाएं, पर उसके साथ-साथ स्वयं की और अन्य आत्माओं की आत्म-ज्योति जलाने का पवित्र संकल्प भी अवश्य लें। यदि दूसरों के प्रति आपके मन के किसी कोने में थोड़ी भी ईष्र्या, नफरत या क्रोध की भावना हो, तो उसे निकाल भगाएं।
साभार - ब्रह्मकुमार निकुंज