बिहार में अज्ञात बीमारी से मरने वाले बच्चों की संख्या शनिवार को 169 पहुंच गई है जबकि अभी 92 बच्चों का इलाज राज्य के विभिन्न अस्पतालों में चल रहा है। राज्य के स्वास्थ्य विभाग के अपर सचिव राजेन्द्र प्रसाद ओझा ने बताया कि अब तक 'एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम' के 458 मामले आये जिसमें से 169 बच्चों की मौत हो गई है। उन्होंने बताया कि राज्य के पटना मेडिकल कॉलेज अस्पताल (पीएमसीएच) और नालंदा मेडिकल कॉलेज अस्पताल (एनएमसीएच), मुजफ्फरपुर के श्रीकृष्ण मेडिकल कॉलेज अस्पताल (एसकेएमसीएच) और केजरीवाल अस्पताल तथा गया के अनुग्रह नारायण मगध मेडिकल कॉलेज अस्पताल में इस बीमारी से पीड़ितों का इलाज कराया जा रहा है।ओझा के अनुसार मुजफ्फरपुर के अस्पतालों में 313 मामले आये जिसमें 112 बच्चों की जान जा चुकी है जबकि पटना के अस्पतालों में 121 मामलों में 46 बच्चों की मौत हुई। इसी तरह गया में 20 बच्चे भर्ती हुए जिनमें से 11 बच्चों की मौत हो गई है। गौरतलब है कि ग्रामीण क्षेत्रों के कई आंकड़े ऐसे भी हैं जिसकी जानकारी सरकार के पास नहीं है। इधर, दिल्ली से आई नेशनल सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल की छह सदस्यीय विशेषज्ञों की टीम लगातार बीमारी प्रभावित गांवों का दौरा कर कई तरह के सैंपल ले रहे हैं।
स्वास्थ्य विभाग के एक अधिकारी ने शनिवार को बताया कि राज्य के दस जिलों में इस बीमारी ने अब तक पांव पसार लिया है। सरकार ने प्रभावित 10 जिलों में चिकित्सकों की छुट्टी पर रोक लगा दी है। गौरतलब है कि पंद्रह वर्ष तक की उम्र के बच्चे इस बीमारी की चपेट में आ रहे हैं, इस कारण मरने वालों में से अधिकांश की आयु एक से सात वर्ष के बीच है। चिकित्सकों के मुताबिक इस बीमारी का मुख्य लक्षण तेज बुखार, उल्टी-दस्त, बेहोशी और शरीर के अंगों में रह-रहकर कंपन होना है। इधर, राज्य के स्वास्थ्य मंत्री अश्विनी चौबे कहते हैं कि मृतकों की संख्या में बढ़ोतरी का मुख्य कारण मरीजों को देर से अस्पताल पहुंचने के कारण है। वे कहते हैं कि इस बीमारी को देखते हुए मुजफ्फरपुर और पटना में नियंत्रण कक्ष कार्य कर रहा है। गांवों में बीमारी को लेकर जागरूकता अभियान भी चलाया जा रहा है। सभी मरीजों का मुफ्त इलाज किया जा रहा है।