राजेश की रचना: पार्वती वाटिका का अजय आनंद
सुबह सुबह मैंने देखा एक दर्जन बंदरये सभी ही थे पार्वती वाटिका के अंदर
इन सबों ने यहां जमकर मचाया था उत्पात
हर्षित मन को पहुंचाया था भारी आघात
सबसे पहले लीचियों पर किया था हमला
इसके बाद जर्दालु आम से किया है कुल्ला
बच्चे बंदरों की आ गयी थी भिंडी की बारी
इधर बड़ों से टूट गयी थी अमरूद की डारी
ये सब देख सहा न जा रहा था इनका खेल
लेकिन इन सभी बंदरों में दिखा अच्छा मेल
सभी लोग लगे इन्हें भगाने की योजना सोचने
तब तक ये सभी लग गए जामुन को नोचने
तभी मन में आया कि, ये हमारे दुश्मन नहीं हैं
हम इंसान हैं, तो ये हमारे पूर्वज और मेहमान हैं
इन्होंने भी पार्वती वाटिका का नाम सुना होगा
तो इसे ही पुरानी अशोक वाटिका समझा होगा
यहां केले थे कच्चे उनको तो छुआ ही नहीं
थे झींगा और खीरा भी, उनको खाया ही नहीं
चीकू का वृक्ष था चुपचाप, उसे कुछ कहा नहीं
कदम्ब के पेड़ देख इनका मन माना भी नहीं
ये भी आये होंगे यहां माता सीता को खोजने
परन्तु नहीं मिलने से लगे कुछ फलों को नोचने
राजेश को लगता है कि ये अभी कहीं नहीं जायेंगे
हमारे साथ गर्मी का अजय आनंद यहीं बिताएंगे
राजेश कानोडिया, पत्रकार
नवगछिया (भागलपुर)
सच्ची घटना 01/06/2022 की