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कविता - कलम-कुदाल का साथ

कविता 

कलम-कुदाल का साथ

गर कलम कुदाल का साथ है।
तो बदले हुए हालात हैं।
धरती पर हरियाली होगी।
घर-घर में खुशहाली होगी।
खिला-खिला सा दिन प्यारा
हंसती-चहकती हर रात है।
गर कलम कुदाल का साथ है।

बिन कलम कुदाल न चोखा।
रह-रहकर खा जाते धोखा।
माटी क्या कोड़े,हाड़ तोड़े।
हाय मारकर किस्मत फोड़े।
सबकुछ दांव लगा भी देते,
फिर भी तो मलते हाथ हैं।
गर कलम कुदाल के साथ है।

कलम से उसकी तेज धार है।
पत्थर पर भारी कड़ा प्रहार है।
चुटकी में मिला देते हैं धूल ।
खिला देते वीरानों में फूल।
मिलाकर लहू-घाम भी अपने,
निखारते कण-कण गात है।
गर कलम कुदाल के साथ है।

फिर पाटे आपस की दूरी।
मिलकर दूर करें मजबूरी।
चले मिलाकर दोनों को साथ।
दिखाएं एक नये करामात।
बदले जिससे किस्मत सबकी
चले चांद -तारों की बारात है।
गर कलम कुदाल के साथ है।

-अभय कुमार भारती

कुशवाहा टोला,लोदीपुर
भागलपुर(बिहार) -812001.

मो.9430024285. , 9798298155.