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हिंदी के किसी भी साहित्यकार को अब तक क्यों नहीं मिला भारत रत्न : स्वामी आगमानंद

हिंदी के किसी भी साहित्यकार को अब तक क्यों नहीं मिला भारत रत्न : स्वामी आगमानंद
"चालीस करोड़ों को हिमालय ने पुकारा" के नूतन संस्करण का विधिवत हुआ लोकार्पण 
भागलपुर। भागलपुर के तिलकामांझी स्थित जिला कृषि कार्यालय के आत्मा सभागार में सोमवार को हिंदी दिवस के उपलक्ष्य में विचार गोष्ठी सह पुस्तक लोकार्पण समारोह का भव्य आयोजन किया गया। पूज्यपाद जगद्गुरु रामानुजाचार्य श्री रामचंद्राचार्य परमहंस स्वामी आगमानंद जी महाराज के पावन सानिध्य में राष्ट्रकवि गोपाल सिंह 'नेपाली' की सुप्रसिद्ध ऐतिहासिक रचना के नूतन संस्करण "चालीस करोड़ों को हिमालय ने पुकारा" का विधिवत लोकार्पण हुआ। इसका संपादन स्‍वामी आगमानंद ने क‍िया है।
समारोह को संबोधित करते हुए स्वामी आगमानंद जी महाराज ने देश में हिंदी की वर्तमान स्थिति और उपेक्षा पर गहरा क्षोभ व्यक्त किया। उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा कि आखिर देश के किसी प्रमुख हिंदी साहित्यकार को अब तक देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' क्यों नहीं दिया गया? स्वामी जी ने कहा कि देश की बहुसंख्यक आबादी की संपर्क भाषा होने के बावजूद हिंदी को वह संवैधानिक व सामाजिक गौरव अब तक प्राप्त नहीं हुआ, जिसकी वह सच्ची हकदार है। संस्कृत सभी भाषाओं की जननी है और उसी से हिंदी का प्रादुर्भाव हुआ है। संस्कृत और हिंदी पूर्णतः वैज्ञानिक और शुद्ध ध्वनि पर आधारित भाषाएं हैं। यह केवल संवाद का माध्यम भर नहीं, बल्कि प्रेम, सद्भाव, आत्मीयता और आपसी सम्मान की जीवंत भाषा है।

सिर्फ औपचारिकता न निभाए सरकार, पढ़ाई में अनिवार्य हो हिंदी
स्वामी आगमानंद जी महाराज ने आगे कहा कि सरकारों को हिंदी दिवस के अवसर पर केवल कुछ रस्मी आयोजनों की औपचारिकता तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि भाषा के संवर्धन और सम्मान के लिए ठोस नीतियां बनानी होंगी। उन्होंने केंद्र व राज्य सरकारों से मांग की कि हर भारतीय तक हिंदी की बुनियादी शिक्षा पहुंचे और इसे विद्यालयों के शैक्षणिक पाठ्यक्रमों में अनिवार्य विषय के रूप में शामिल किया जाए।

समारोह में उपस्थित विधान पार्षद (एमएलसी) विजय कुमार सिंह ने कहा कि हम सभी के मन में अपनी भाषा हिंदी के प्रति सम्मान सदैव अक्षुण्ण रहा है। हिंदी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह हमें जोड़ना और प्रेम से रहना सिखाती है।

राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूंगा है: गीतकार राजकुमार

विशिष्ट वक्ता के रूप में मौजूद वरिष्ठ गीतकार राजकुमार ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के विचारों का स्मरण कराते हुए कहा कि बापू ने कहा था कि राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूंगा है। इसलिए हिंदी के प्रति उदासीनता वास्तव में राष्ट्र की आत्मा के प्रति उदासीनता के समान है, क्योंकि हिंदी ही समूचे भारत की साझा संस्कृति और ऐतिहासिक परंपरा की सच्ची संवाहिका है।

'संस्कृत सब भाषा की जननी... प्यारी सुंदर बेटी हिंदी', काव्य पाठ से बंधी समां

समारोह का मुख्य आकर्षण भजन सम्राट डॉ. हिमांशु मोहन मिश्र 'दीपक' का ओजस्वी काव्य पाठ रहा। उन्होंने हिंदी की महिमा पर आधारित अपनी स्वरचित कविता प्रस्तुत कर सभागार में उपस्थित साहित्यप्रेमियों को भावविभोर कर दिया - "संस्कृत सब भाषा की जननी, प्यारी सुन्दर बेटी हिन्दी। दुनियां की जितनी भाषाएं, सबकी बड़ी बहन है हिन्दी। सब भाषा का आदर करती, इतनी सहज सरल है हिन्दी॥
कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्‍वलन के बाद सुश्री अर्पिता चौधरी द्वारा प्रस्तुत सुमधुर गुरु वंदना से हुआ। इसके बाद लाल बाबू और रिया उपाध्याय ने भक्तिपूर्ण भजनों की मनमोहक प्रस्तुति दी। पूरे मंच का गरिमामयी संचालन पंडित दिलीप शास्त्री सक्सेना ने किया।
समारोह में प्रमुख वक्ता के रूप में डॉ. वीरेन्द्र शर्मा, डॉ. मथुरानाथ दूबे, डॉ. जीवनानन्द स्वामी, डॉ. अरविन्द कुमार झा, डॉ. मिहिर मोहन मिश्र 'सुमन', प्रो. राजेन्द्र कुमार सिंह और डॉ. विजय कुमार वर्मा ने भी अपने विचार रखे और हिंदी के वैश्विक फलक को रेखांकित किया।
इस अवसर पर संयोजक श्री कुंदन बाबा, उपेन्द्र प्रसाद सिंह, श्री प्रभात कुमार सिंह, निवेदक राजीव सिंह, तन्नू सिंह, जदयू जिलाध्यक्ष विवेकानंद गुप्ता, कहलगांव नगर परिषद के अध्यक्ष संजीब जी, सुड्डू साईं, अभिनव सिंह, दीपक यादुका, डॉ. विवेक कुमार, आलोक कुंदन, मधुव्रत चौधरी, बिल्टज, श्वेत कमल, आशीष पांडेय, सौरभ सोनू, आशु सहित बड़ी संख्या में शहर के प्रबुद्ध नागरिक और साहित्य अनुरागी उपस्थित रहे।