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महिलाएं समाज और राष्ट्र की शक्ति होती हैं: डॉ अवधेश रजक

महिलाएं समाज और राष्ट्र की शक्ति होती हैं: डॉ अवधेश रजक 

राजेश कानोड़िया, नवगछिया। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर रविवार को मदन अहल्या महिला महाविद्यालय, नवगछिया के हिन्दी विभाग, गृह विज्ञान विभाग एवं आईक्यूएसी के संयुक्त तत्वावधान में ऑनलाइन माध्यम से ‘21वीं सदी में भारतीय स्त्री’ विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी हुई। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए महाविद्यालय के प्रधानाचार्य डॉ.अवधेश रजक ने कहा कि महिलाएं समाज और राष्ट्र की शक्ति होती हैं। महिलाओं ने हर क्षेत्र में प्रतिभा, श्रम और जिजीविषा से अपना लोहा मनवाया है। 21वीं सदी के इस मोड़ पर खड़े होकर हम यह कह सकते हैं कि महिलाओं के लिए सम्मानजनक परिवेश निर्मित करने से ही सशक्त महिलाऐं सामने आएंगी। लैंगिक समानता को बढ़ावा देने में बिहार सरकार की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। 

वहीं कार्यक्रम की मुख्य अतिथि अंतरराष्ट्रीय बॉक्सिंग चैंपियन एवं डी.एस.पी(झारखंड) श्रीमती अरुणा मिश्रा ने कहा कि स्त्री और पुरुष एक–दूसरे के विलोम नहीं हैं। महिलाएं यदि आगे बढ़ती हैं तो उसमें परिवार की भी अहम भूमिका रहती है। इसलिए द्वेषपूर्ण विमर्श की जगह परिवार और समाज में सहयोगात्मक रवैये को बढ़ावा देना होगा। स्त्री और पुरुष आपसी तालमेल से हरसंभव सफलता पा सकते हैं। स्त्रियाँ संघर्ष और चुनौतियों को पूरे साहस से स्वीकारना सीखें। वे जब तक हार मानने की प्रवृत्ति का त्याग नहीं करेंगी तब तक उनकी वस्तुस्थिति में परिवर्तन मुश्किल है। इसके लिए हमें ऐसा सामाजिक–पारिवारिक परिवेश तैयार करना होगा, जहाँ वे अपनी प्रतिभा और क्षमता का सर्वश्रेष्ठ दे सकें। मिश्र ने अपने बॉक्सिंग और पुलिस जीवन के कई संस्मरणों को भी साझा किया।

वहीं कार्यक्रम की मुख्य वक्ता सुंदरवती महिला महाविद्यालय, भागलपुर की हिंदी विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ.आशा तिवारी ओझा ने कहा कि स्त्री का विकास राष्ट्र के विकास का पैमाना है। 21वीं सदी में महिलाएं घर के बजट से लेकर देश का बजट तक बना रही हैं। महिलाओं की स्थिति में एक तरफ सुधार दिखता है तो दूसरी तरफ उनके साथ बर्बर हिंसा और दमन की विद्रूप स्थिति भी बनी ही हुई है। दहेज प्रथा, कन्या भ्रूण हत्या जैसे कलंक आज भी हमारे समाज के माथे से मिट नहीं सके हैं। ‘बेटी पढ़ाओ–बेटी बचाओ’ जैसी योजनाएं यह दर्शाती हैं कि महिलाएं कितनी असुरक्षित और संकटग्रस्त जीवन जी रही हैं। इसलिए उन्हें प्रोत्साहन की आवश्यकता है। आज हमें स्त्री विमर्श को बौद्धिक गलियारे से निकाल कर जनजीवन के रोजमर्रा के विमर्श तक ले जाना होगा। सेमिनार हॉल से लेकर घर की बैठिकी तक इसे पहुंचाना होगा। स्त्रियों को देवी नहीं मनुष्य का दर्जा दीजिए। इसी से समानता आएगी। 

वहीं मदन अहल्या महिला महाविद्यालय के वरीय शिक्षक डॉ.राजीव कुमार सिंह ने कहा कि आधी आबादी की सामाजिक–आर्थिक–राजनीतिक  सहभागिता के बिना हमारा देश समर्थ नहीं बन सकता। महिलाओं की उन्नति वास्तव में देश की उन्नति है। 
डॉ. अमरेंद्र कुमार सिंह ने कहा कि महिलाओं के उत्थान और सुरक्षा के लिए हर नारी को जागरूक करना आवश्यक है। जिस तरह से परिवार की गाड़ी दोनों पहियों के बल पर ही आगे बढ़ती है, उसी तरह से देश व दुनिया का रथ भी नर-नारी, दोनों के सहयोग से ही खिंच सकेगा। जब दुनिया समावेशी विकास के पथ पर आगे बढ़ेगी, तभी महिला दिवस मनाने की सार्थकता भी है।             कार्यक्रम का संचालन डॉ.ममता कुमारी तथा धन्यवाद ज्ञापन आईक्यूएसी के समन्वयक डॉ. धर्मेंद्र दास ने किया।                  

इस अवसर पर कार्यक्रम के संयोजक डॉ.अनुराधा, डॉ.किरण कुमारी, डॉ.आरती कुमारी डॉ. पुष्पा कुमारी,डॉ. नाहिदा फातिमा, डॉ.नीलू, मारवाड़ी महाविद्यालय,दरभंगा के सहायक प्राध्यापक डॉ.गजेन्द्र भारद्वाज, मुंबई विश्वविद्यालय, महाराष्ट्र के डॉ.वेद प्रकाश दुबे आदि ने भी अपनी बातें रखीं। महाविद्यालय की छात्रा राजकन्या ने स्त्री–मुक्ति से संबंधित लोकगीत प्रस्तुत किया तथा दीक्षा ने स्वरचित कविता का पाठ किया।