प्रकृति के अंदर समाहित संवेदनाओं को ग्रहण करने पर मन शरीर पर प्रभाव डालता है। जिससे शरीर में पैदा होती हैं सारी व्याधियां। जिसे दूर करने के लिए
हमारे ऋषि मुनि भी प्राचीन काल से योगा करते आ रहे हैं। शरीर के विकास के लिए योगा बहुत जरुरी है। आधुनिक विज्ञान से प्रभावित होने वाले मन को अध्यात्म के प्रति जागरूकता से नियंत्रित किया जा सकता है। इसके अलावा प्राचीन विधि में कपिल मुनि ने आयुर्वेद द्वारा मनोदैहिक व्याधि का उपचार संभव बताया है।
हमारे ऋषि मुनि भी प्राचीन काल से योगा करते आ रहे हैं। शरीर के विकास के लिए योगा बहुत जरुरी है। आधुनिक विज्ञान से प्रभावित होने वाले मन को अध्यात्म के प्रति जागरूकता से नियंत्रित किया जा सकता है। इसके अलावा प्राचीन विधि में कपिल मुनि ने आयुर्वेद द्वारा मनोदैहिक व्याधि का उपचार संभव बताया है।
उपरोक्त बातें तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ रामा शंकर दुबे ने मंगलवार को स्थानीय मदन अहल्या महिला महाविद्यालय में मनोविज्ञान विभाग द्वारा आयोजित एक दिवसीय सेमीनार के उदघाटन के दौरान कही। जिसका विषय ही था मनोदैहिक व्याधि। जिस पर लगभग तीस मिनट तक जानकारी देते हुए उन्होंने सेमीनार में मौजूद छात्राओं को सलाह देते हुए कहा कि हमें अपने मन और शरीर को विकसित करना होगा। जब हम अपने को ठीक रखेंगे तभी हमारा परिवार, समाज तथा देश ठीक रह पायेगा।
इस मौके पर प्रतिकुलपति प्रो0 एके राय ने मनोदैहिक व्याधि को दूर करने के लिए कहा कि जब तक मन और आत्मा के भाव को नहीं मिलाया जाएगा। तबतक मनोदैहिक व्याधि दूर नहीं की जा सकती।
इस सेमीनार को प्रो0 रत्ना मुखर्जी और प्रो0 मीरा जायसवाल तथा प्रो0 चंद्र भूषण सिंह ने भी संबोधित किया। जहां प्राचार्या डॉ निशा राय ने सभी अतिथि और उपस्थित लोगों का स्वागत किया। वहीं इसका संचालन प्रो0 अमरेंद्र कुमार सिंह ने किया।
इस मौके पर प्रतिकुलपति प्रो0 एके राय ने मनोदैहिक व्याधि को दूर करने के लिए कहा कि जब तक मन और आत्मा के भाव को नहीं मिलाया जाएगा। तबतक मनोदैहिक व्याधि दूर नहीं की जा सकती।
इस सेमीनार को प्रो0 रत्ना मुखर्जी और प्रो0 मीरा जायसवाल तथा प्रो0 चंद्र भूषण सिंह ने भी संबोधित किया। जहां प्राचार्या डॉ निशा राय ने सभी अतिथि और उपस्थित लोगों का स्वागत किया। वहीं इसका संचालन प्रो0 अमरेंद्र कुमार सिंह ने किया।