- नवगछिया अनुमंडल अंतर्गत गोपालपुर, इस्माइलपुर व खरीक प्रखंडों के दर्जनों गांव के ग्रामीण बाढ़ त्रासदी की दोहरी मार का झेलने को मजबूर हैं।
- सर्वाजनिक स्थानों में शरण लिए 30 हजार बाढ़ पीड़ितों का छत खुला आसमान व बिछावन जमीन बनी हुई है।
- जहां जानवर और इंसान एक समान बने हुए है। प्रशासन व जनप्रतिनिधियों में पीड़ितों की सुध लेने की पुर्सत किसी में नहीं हैं।
इसे विडंबना कहें या कुछ और। गंगा किनारे बसे दर्जनों गांव बाढ़ की
चपेट में है। पीड़ित घर-वार छोड़ कर सार्वजनिक स्थानों पर विस्थापितों की
जिंदगी जीने को मजबूर हैं। प्रशासनिक मदद ऊंट के मुह में जीरा जैसी है।
पीड़ित प्लास्टिक व फूंस का घर बना कर जैसे-तैसे जिंदगी काट रही हैं।
प्रशासन की ओर टकटकी लगाए बैठे पीड़ितों को समुचित मदद नहीं मिल रही है।
एक घाट में इंसान-जानवर पी रहे पानी
बाढ़ पीड़ितों को शुद्ध पेयजल, बिजली, शौचालय आदि की व्यवस्था कराने
की प्रशासनिक घोषण छलावा बन कर रह गई है। नतीजतन, गंगा के एक ही घाट पर
जानवर व इंसान पानी पीने को मजबूर हैं। इतना ही नहीं वारिस होने पर इंसान
और जानवर एक छत के नीचे आ जाते हैं। ग्रामीण कहते हैं कि उपर का शुक्र है
शरणस्थली में कोई महामारी नहीं फैली है। वरना, अस्पताल पंहुचने से पहले ही
कितनों की मौत हो जाती।
नावों पर मुखिया के गुर्गो का वर्चस्व
बाढ़ प्रभावित वाले इलाकों में सरकारी नावों पर मुखिया व उसके गुर्गो
का है। आम पीड़ितों के गंगा में तैर कर या किराया देकर ही जरुरत के स्थानों
पर जाने को मजबूर है। पुलिस व जिला प्रशासन महकमा कोई भी कदम उठाने से
कतराते हैं।
क्या कहते हैं सीओ
गोपालपुर के सीओ देवेन्द झा ने बताया कि लिस्ट के हिसाब से बाढ़
प्रभावितों के बीच राहत सामग्री बांटी जा रही है। नाव पर किसी के कब्जे की
शिकायत उनके पास नहीं किया है।
