राजेश कानोडिया।
आज अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस है। जिसे पूरे विश्व में मनाया जाएगा। नवगछिया में भी मानवाधिकार के नाम पर कई संगठन कार्यरत बताए जाते हैं। जिनका कार्यकलाप सिर्फ उनकी फाइलों में ही सिमटा नजर आता है। या फिर उनके संगठन की भूमिका अथवा कार्यकलाप वे ही बता सकते हैं। जहां बच्चे शिक्षा से वंचित हो कर रहे हैं बाल श्रम, युवतियों का हो रहा है यौन शोषण, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हो रहा कुठाराघात, जारी है महिलाओं पर अत्याचार, हो रहा है वृद्धों का अपमान, स्वास्थ्य सेवाओं का बिगड़ता स्वास्थ्य, राशन किरासन से वंचित है उसके अधिकारी।
अफसोस है कि मानवाधिकार का सच बेहद कड़वा है। कानून और नीतियों की आड़ में मानवाधिकारों का हनन और हरण आम हो रहा है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से लेकर, मौलिक व संविधान में मिले अधिकारों पर खूब कुठाराघात होता रहा है। थानों में लोग न्याय के लिए भटकते हैं, तो अन्य दफ्तरों में पेंशन और सरकारी बैशाखियों के लिए। अपने अधिकार के लिए पहले तो लोग एड़ियां रगड़ते हुए दफ्तरों तक पहुंचते हैं। फिर, अफसरों और बाबुओं के सामने हाथ फैलाने पड़ते हैं, गिड़गिड़ाना पड़ता है।
सच तो यह है कि उन्हें जानबूझकर इससे अनभिज्ञ रखा जाता है। कोई गोष्ठी या समारोह आयोजित कर मानवाधिकारों की जानकारी देने की कोई पहल शासन और प्रशासन द्वारा नहीं होती। इससे न तो रोटी का अधिकार मिला है और न पढ़ाई का। महिला सुरक्षा को लेकर कोई सतर्कता नहीं दिखती। आए दिन छेड़छाड़ की घटनाएं संज्ञान में आती हैं।
संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 1948 में 10 दिसंबर को विश्व मानवाधिकार दिवस की शुरूआत की। इस दिन को मानवाधिकारों की रक्षा और उसे बढ़ावा देने के लिए तय किया, लेकिन हमारे देश में मानवाधिकारी कानून को अमल में लाने के लिए काफी लंबा समय लग गया। भारत में 26 सितंबर 1993 से मानवाधिकारी कानून अमल में लाया गया। जिसका असर आम लोगों से छिपा नहीं है।
आज अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस है। जिसे पूरे विश्व में मनाया जाएगा। नवगछिया में भी मानवाधिकार के नाम पर कई संगठन कार्यरत बताए जाते हैं। जिनका कार्यकलाप सिर्फ उनकी फाइलों में ही सिमटा नजर आता है। या फिर उनके संगठन की भूमिका अथवा कार्यकलाप वे ही बता सकते हैं। जहां बच्चे शिक्षा से वंचित हो कर रहे हैं बाल श्रम, युवतियों का हो रहा है यौन शोषण, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हो रहा कुठाराघात, जारी है महिलाओं पर अत्याचार, हो रहा है वृद्धों का अपमान, स्वास्थ्य सेवाओं का बिगड़ता स्वास्थ्य, राशन किरासन से वंचित है उसके अधिकारी।
अफसोस है कि मानवाधिकार का सच बेहद कड़वा है। कानून और नीतियों की आड़ में मानवाधिकारों का हनन और हरण आम हो रहा है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से लेकर, मौलिक व संविधान में मिले अधिकारों पर खूब कुठाराघात होता रहा है। थानों में लोग न्याय के लिए भटकते हैं, तो अन्य दफ्तरों में पेंशन और सरकारी बैशाखियों के लिए। अपने अधिकार के लिए पहले तो लोग एड़ियां रगड़ते हुए दफ्तरों तक पहुंचते हैं। फिर, अफसरों और बाबुओं के सामने हाथ फैलाने पड़ते हैं, गिड़गिड़ाना पड़ता है।
सच तो यह है कि उन्हें जानबूझकर इससे अनभिज्ञ रखा जाता है। कोई गोष्ठी या समारोह आयोजित कर मानवाधिकारों की जानकारी देने की कोई पहल शासन और प्रशासन द्वारा नहीं होती। इससे न तो रोटी का अधिकार मिला है और न पढ़ाई का। महिला सुरक्षा को लेकर कोई सतर्कता नहीं दिखती। आए दिन छेड़छाड़ की घटनाएं संज्ञान में आती हैं।
संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 1948 में 10 दिसंबर को विश्व मानवाधिकार दिवस की शुरूआत की। इस दिन को मानवाधिकारों की रक्षा और उसे बढ़ावा देने के लिए तय किया, लेकिन हमारे देश में मानवाधिकारी कानून को अमल में लाने के लिए काफी लंबा समय लग गया। भारत में 26 सितंबर 1993 से मानवाधिकारी कानून अमल में लाया गया। जिसका असर आम लोगों से छिपा नहीं है।
