राजेश कानोडिया, नवगछिया ।
अब तो चुनाव भी एक खेल की तरह ही साबित होने लगा है। इस खेल के आयोजक होते हैं बड़ी सोच वाले व्यवसायी। जिसके निर्णायक होते हैं राजनैतिक दल। इसमें स्टार खिलाड़ियों की तरह शामिल किया जाता है नमक, प्याज और तेल जैसे आम उपभोक्ता की अत्यावश्यक वस्तु को ।
यह कोई नई परंपरा या कहानी नहीं है, बल्कि एक हकीकत है। जो काफी पुरानी है। आम लोग जिसके ज़िम्मेवार के तौर पर राजनैतिक पार्टी को ही मानते हैं। जो खुले शब्दों में कहते हैं - चुनाव आ रहा है पता नहीं कब क्या क्या महंगा हो जाएगा। हर बार की तरह इस बार भी यही हुआ भी।
इस बार कई राज्यों में विधान सभा चुनाव से ठीक पहले प्याज ने दिल्ली से लेकर नवगछिया तक जमकर अपना तेवर दिखाया। यह तेवर चुनावी नतीजों के बाद पूरी तरह से धारासायी हो गया। सौ रुपये किलो तक बिकने वाला प्याज अब पच्चीस रुपये के भाव पर झूल रहा है। जबकि इस तेवर की वजह किसी भी आम उपभोक्ता के समझ से परे ही रही। इस मामले में राजनैतिक दलों के नेता सिर्फ बयानबाजी तक ही सीमित रहे।
इसी बीच प्याज के बढ़ते तेवर को नमक नहीं सह सका। उसने भी एकाएक छक्का लगाने की कोशिश भरपूर कोशिश की। लेकिन बेचारा नमक छक्का के फेर में मैदान से ही आउट हो गया। नमक का बुरा हाल देख तेल इस बार सहम ही गया। जिसने एक समय में इंदिरा गांधी तक की गद्दी हिला दी थी। अब इस खेल के चक्कर में पड़ने वाले सभी लोग अपनी समझदारी को कोस रहे हैं।
