विश्व कविता दिवस: हर बड़े आंदोलन से समाज, संस्कृति के साथ–साथ साहित्य भी बदलता है: राजेश जोशी
राजेश कानोड़िया, नवगछिया। विश्व कविता दिवस के अवसर पर नवगछिया नगर स्थित मदन अहल्या महिला महाविद्यालय के तत्वावधान में ‘जनमुक्ति और कविता’ विषयक संगोष्ठी एवं कवि सम्मेलन का आयोजन हाइब्रिड (ऑनलाइन/ऑफलाइन) माध्यम से प्रो. चंद्रभानु प्रसाद सिंह की अध्यक्षता में किया गया। कार्यक्रम का संचालन महाविद्यालय के सह–प्राचार्य डॉ.अमरेंद्र कुमार सिंह ने तथा धन्यवाद ज्ञापन संगोष्ठी के आयोजन सचिव डॉ.धर्मेन्द्र दास ने किया। मैथिली स्वागत गीत से स्नातक छात्रा राजकन्या ने अतिथियों का अभिनंदन किया। कार्यक्रम का उद्घाटन करते हुए महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ.अवधेश रजक ने कहा कि कविता और जनमुक्ति का गहरा सम्बन्ध रहा है। दोनों को अलग कर के नहीं देखा जा सकता।
मुख्य वक्ता सुप्रसिद्ध जनवादी कवि राजेश जोशी ने कहा कि जब भी कोई बड़ा आंदोलन होता है वह समाज, संस्कृति के साथ–साथ साहित्य को भी बदलता है। आप देखें, मुक्त छंद की कविता फ्रांसिसी क्रांति से उद्भूत हुई। वहीं हिन्दी में जहाँ ब्रज में कविता लिखी जा रही थी स्वाधीनता आंदोलन के उत्कर्ष काल में वह खड़ी बोली में लिखी जाने लगी। आधुनिक हिन्दी कविता स्वाधीनता आंदोलन के साथ–साथ विकसित होती है। 1936 से 1956 तक प्रगतिवाद आंदोलन चलता है, जिसके प्रभाव में कविता की अंतर्वस्तु और शिल्प दोनों में निर्णायक बदलाव आते हैं। इसके बाद भी जनमुक्ति आंदोलन और कविता का अंतर्संबंध प्रगाढ़ बना रहता है। दरअसल दुनिया में हुए जनमुक्ति के आंदोलनों का कविता में अनिवार्य स्थान है क्योंकि कविता जनमुक्ति और जनपक्षधरता के बिना अपने उद्देश्य को पूरा नहीं कर पाती।
विशिष्ट वक्ता प्रो. भरत प्रसाद (पूर्वोत्तर पर्वतीय विश्वविद्यालय, शिलांग) ने कहा कि जनमुक्ति का स्वप्न राष्ट्र की सीमाओं से परे वैश्विक प्रश्न है। यह है तो आधुनिक प्रश्न लेकिन इसकी पूरे विश्व में सुदीर्घ परम्परा रही है। जनमुक्ति केवल राजनीतिक अधिकारों का ही नहीं बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक, भाषिक, लैंगिक और आर्थिक अधिकारों से जुड़ा हुआ व्यापक प्रश्न है। जनमुक्ति को इन तमाम स्तरों पर तलाशना होगा तभी वह सच्चे अर्थों में प्राप्त हो सकती है। विश्व के अलग–अलग देशों में जनमुक्ति के आंदोलन हुए हैं जिनका वहाँ के साहित्य पर सीधा प्रभाव पड़ा। मिसाल के तौर पर जनमुक्ति के बड़े कवि महमूद दरवेश, नाजिम हिकमत, पाब्लो नेरुदा, ब्रेख्त आदि की कविताएं देखी जा सकती हैं। जनमुक्ति का स्वप्न आज भी अधूरा है। इसे पूरा करने के लिए जनपक्षधर कविता के साथ–साथ जनपक्षधर राजनीति की माँग भी होनी चाहिए। दोनों के सहमेल से नया शोषणमुक्त सभ्य, सुसंस्कृत समाज बनेगा।
अध्यक्षीय उद्बोधन में ल.ना. मि. वि के पूर्व मानविकी संकायाध्यक्ष प्रो.चंद्रभानु प्रसाद सिंह ने कहा कि सन 1999 में यूनिसेफ ने 21 मार्च को विश्व कविता दिवस मानने का निर्णय लिया था। तब से यह परम्परा चली आ रही है। विश्व कविता दिवस पर आयोजन अपने आप में आह्लादकारी है। वास्तव में, समाज जितना जटिल होगा, कविता का दायित्व उतना ही बढ़ता जाएगा। आज यहाँ हाइब्रिड (ऑनलाइन–ऑफलाइन) माध्यम से संगोष्ठी के साथ हुए कवि–सम्मेलन से यह बात उभरती है कि समकालीन कविता अपने समय और समाज से सघन संवाद करती है। इसलिए यह आश्वस्त होकर कहा जा सकता है कि कविता का भविष्य उज्ज्वल है।
कार्यक्रम के दूसरे सत्र में हुए कवि सम्मेलन में हिन्दी, मैथिली, बज्जिका, अंगिका, मगही, भोजपुरी आदि भाषाओं में विभिन्न कवियों ने कविता पाठ किया। डॉ. अशोक मेहता, विनिताभ, अभय कुमार, डॉ.निशांत, उपासना झा, अविनाश भारती, अमित मिश्रा,सुबोध मंडल, सुरेश बिंद, मोनालिशा पोद्दार आदि ने हिन्दी, अंगिका और मैथिली की कविताओं से श्रोताओं को भाव–विभोर कर दिया। मौके पर महाविद्यालय के सहायक प्राध्यापक डॉ.राजीव कुमार सिंह, डॉ.विनीता कुमारी, डॉ.नीलू कुमारी, डॉ.ममता झा, डॉ.सन्तोष कुमार, साहित्य–अध्येता डॉ.अभिषेक कुमार सिन्हा, श्री दुर्गानंद ठाकुर, सियाराम मुखिया, समीर, वेदप्रकाश, दीक्षा मिश्रा सहित बड़ी संख्या में शिक्षक, शोधार्थी एवं छात्र–छात्राएं संगोष्ठी से जुड़े हुए थे।