'रमैया
वस्तावैया' हिन्दी फिल्मों के उन पॉपुलर गानों की तरह है जो घिसे-पिटे
शब्दों से भरे होने के बावजदू कई बार बोरिंग नहीं लगते। उन गानों की तरह ही यह फिल्म भी गिरते-पड़ते ही सही दर्शकों का मनोरंजन कर देती है।
यह फिल्म पुरानी कहानी और कमजोर हीरो की वजह से औसत बनकर रह गयी वर्ना फिल्म को अच्छी बनाने के सारे मसाले फिल्म में डाले गए हैं। प्रभुदेवा एक अच्छे संगीत निर्देशक बन सकते हैँ लेकिन एक फिल्म निर्देशक के रूप में वह उन्हीं दृश्यों की कल्पना कर सकते हैं जिन दृश्यों को वह पहले कुछ फिल्मों में देख चुके होते हैं। यानि प्रभु सोचा हुआ सोच सकते हैं मौलिक नहीं। और यही फिल्म की कमजोरी है।
इंटरवल के पहले कई फिल्मों का मिश्रण लगती यह फिल्म इंटरवल के बाद कहानी की टोन में बहुत हद तक 'मैंने प्यार किया' जैसी होती जाती हैं। जहां फिल्म का अमीर नायक गरीब लड़की के परिवार वालों का दिल जीतने के लिए जीतोड़ मेहनत करता है।
प्रभुदेवा की अपनी खुद की सीमाएं हैं। एक्टर के रूप में न्यूकमर गिरीश तौरानी और श्रुति हसन को लेकर उन्होंने बहुत हद तक फिल्म की रेखाएं खुद ही खींच दी हैं। लेकिन देखी-सुनी सी कहानी लगने के बाद भी टुकडों में यह फिल्म अच्छी लगती हैं। खासकर कुछ गाने और कॉमेडी।
अमीर नायक और गरीब नायिका की कहानी
आस्ट्रेलिया में बसा राम (गिरीश कुमार)अपने मामा की लड़की की शादी में हिस्सा लेने के लिए भारत आया हुआ होता है। यहां उसे अपनी ममेरी बहन की सहेली सोना (श्रुति हसन)मिलती है। बिल्कुल अलग-अलग मिजाज होने के बावजूद उनमें प्यार हो जाता है। लेकिन राम की मां नहीं चाहती कि उसके बेटे की शादी एक गरीब लड़की से हो। (दर्जनों फिल्मों में आजमाया जा चुका फॉर्मूला) वह सोना और उसके भाई रघुवीर (सोनू सूद)को जलील करती है।
जब इस बात का पता राम को लगता है तो वह आधे रास्ते से लौटकर सोना के गांव उसे और उसके भाई को मनाने के लिए आता है। रघुवीर उसके सामने एक अजीब शर्त रखता है। इंटरवल के बाद की कहानी यह दिखाती है कि कैसे राम, सोना को पाने के लिए अपने को कष्टों के भाड़ में झोंक देता हैं। कई देखी सुनी हिंदी फिल्मों की तरह ही इस फिल्म में बाद में कुछ बुरे लोगों की आंखे खुल जाती हैं और बाकी बुरे लोग मारे जाते हैं।
अभिनय की टोकरी लगभग खाली
फिल्म के हीरो गिरीश कुमार इस फिल्म के निर्माता कुमार तौरानी के बेटे हैं। यह तो निश्चित है कि यदि गिरीश इस फिल्म के निर्माता के बेटे न होते तो उन्हें इस तरह का प्लेटफॉर्म न मिलता। इस स्वाभाविक आरोप के बीच गिरीश कुमार बहुत निराश नहीं करते। एक नॉन सीरियस लड़के से एक समर्पित प्रेमी बन जाने के किरदार को उन्होंने ठीक ढंग से ही निभाया है।
गिरीश के हिस्से कॉमेडी के जो सीन आए हैं उनमें वे थोड़े मेच्योर दिखते हैं। श्रुति हसन की यह पहली हिंदी फिल्म है जिसमें वह मुख्य धारा की अभिनेत्री का रोल कर रही हैं। अपने मासूमियत भरे चेहरे वाले अभिनय से श्रुति इस रोल के लिए औसत रहीं। 'जोधा अकबर' के बाद भाई के किरदार में सोनू सूद ने एक बार फिर से प्रभावित किया है। विनोद खन्ना, पूनम ढिल्लो, रणधीर कपूर, सतीश शाह, जाकिर हुसैन अपने-अपने किरदारों में थोड़ी ओवरऐक्टिंग के साथ फिट हैं।
कुछ मौलिक भी सोचिए 'प्रभु'
एक निर्देशक के रूप में यह प्रभुदेवा की तीसरी हिंदी फिल्म है। इसके पहले प्रभु की दोनों फिल्में 'वांटेड' और 'राउठी राठौर' हिट साबित हुई थीं। उन फिल्मों के हिट होने की एक बड़ी वजह स्टारकॉस्ट थी। यह पहली बार है जब प्रभु नए कलाकारों के साथ फिल्म बना रहे हैं।
साउथ फिल्मों के रंग-ढंग की तरह प्रभु की इस तीसरी फिल्म का टोन लाउड ही है। वहां पर भी जब खामोशी से सिर्फ कैमरे को अपना काम करते रहने देने की जरूरत थी। मुख्य धारा की हिंदी फिल्म बनाने के लिए प्रभु को अभी मौलिक रूप से सोचना होगा। अभी तक उन्होंने सोचे हुए को ही तोड़-मरोड़ कर पेश किया है। यह उनकी बड़ी कमजोरी है। �
गाने सुनने लायक
फिल्म का थीम ट्रैक "जीने लगा हूं" सुनने में बेहद खूबसूरत हैं। यह गाना फिल्म में जहां-जहां बैकग्राउंड में आता है फिल्म खूबसूरत हो उठती है। इसके अलावा जैकलीन फर्नांडीज पर फिल्माया गया आयटम सॉन्ग "जादू की झप्पी" सुनने के साथ देखने में भी अच्छा है। "हिप हॉप पम्मी" और "रंग जो लाग्यो" भी ठहरकर सुनने का मन करता है।
क्यों देखें
एक रोमांटिक कॉमेडी फिल्म को कुछ अच्छे गानों के साथ देखने के लिए।
क्यों न देखें
यदि आप इसे एक नए किस्म की रोमांटिक फिल्म समझकर देखने जा रहे हों।