सुप्रीम कोर्ट ने बिहार में कुलपतियों व प्रति कुलपतियों की नियुक्ति के
आदेश पर फिलहाल रोक लगा दी है। कोर्ट ने नियुक्ति से संबंधित दस्तावेज व
फाइलें भी तलब की हैं। फिलहाल कुलपति व प्रति कुलपति अपने पद पर काम नहीं
करेंगे और उनका कामकाज विश्वविद्यालय के वरिष्ठतम डीन देखेंगे।
मालूम हो कि बिहार के राज्यपाल ने गत नौ फरवरी को छह कुलपतियों और दो प्रति कुलपतियों की नियुक्ति की थी। राज्यपाल ने पटना हाई कोर्ट के गत जनवरी के फैसले के बाद ये नियुक्तियां की थीं। राम तवक्या सिंह व बिहार सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दाखिल कर हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती दी है। जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने ये आदेश जारी किया।
न्यायमूर्ति जीएस सिंघवी की अध्यक्षता वाली पीठ ने सोमवार को कुलपतियों और प्रति कुलपतियों की नियुक्ति के आदेश पर अंतरिम रोक लगाते हुए कहा है कि विश्वविद्यालय के वरिष्ठतम डीन कुलपतियों का कामकाज देखेंगे। कोर्ट ने विश्वविद्यालय के चांसलर ऑफिस के रजिस्ट्रार को निर्देश दिया है कि वे नियुक्ति से संबंधित फाइलें व दस्तावेज सील बंद लिफाफे में सुप्रीम कोर्ट में दाखिल करें। साथ ही सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री से कहा है कि वह इस आदेश को फैक्स के ंजरिये रजिस्ट्रार चांसलर ऑफिस भेजे।
इससे पहले मामले पर सुनवाई के दौरान पीठ ने कुछ सख्त टिप्पणियां भी कीं। पीठ ने कहा कि नियुक्तियां पद की गरिमा के अनुरूप होनी चाहिए। दो नियुक्तियां तो राज्यपाल के स्थानांतरण आदेश के बाद की गई। पीठ ने कहा कि लगता है कि भ्रष्टाचार जीवनशैली का हिस्सा हो गया है। ये टिप्पणियां कोर्ट ने याचिकाकर्ता तवक्या सिंह व बिहार सरकार की ओर से पेश दलीलों को सुनने के बाद कीं। इससे पहले बिहार सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे ने पीठ को अखबार की कटिंग दिखाई जिसमें लिखा था कि नियुक्तियां स्थानांतरण आदेश के बाद भी हुई हैं। तवक्या सिंह के वकील ने कहा कि नियुक्तियों में तय प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया है। इसमें राज्य सरकार से परामर्श नहीं हुआ है। यह भी आरोप लगाया गया है कि जिन लोगों की नियुक्ति हुई है उन पर गंभीर आरोप लगे हैं।
कुलपतियों की ओर से पेश वकीलों ने अंतरिम आदेश का विरोध किया। उन्होंने कहा कि नियुक्तियां हाई कोर्ट के आदेश के अनुरूप हुई हैं। उनमें कोई खामी नहीं है। राज्यपाल को नियुक्ति करने का अधिकार है।
मालूम हो कि तवक्या सिंह ने पटना हाई कोर्ट में जनहित याचिका दाखिल कर कुलपति नियुक्तियों का मुद्दा उठाया था। जिसमें कहा गया था कि राज्यपाल राज्य सरकार से परामर्श के बगैर कुलपति की नियुक्ति नहीं कर सकते। हाई कोर्ट ने इस याचिका पर दिए गए आदेश में कहा कि राज्यपाल को नियुक्तियां करने का अधिकार है। हाई कोर्ट ने नियुक्तियों के संबंध में दिशानिर्देश भी तय कर दिए थे। बिहार सरकार ने याचिका दाखिल कर हाई कोर्ट के दिशानिर्देशों का विरोध किया है। राज्य सरकार का कहना है कि कुलपति की नियुक्तियों के बारे में तय हाई कोर्ट के दिशानिर्देश कानून के खिलाफ हैं। कानून में नियुक्तियों के बारे में राज्य सरकार से प्रभावी परामर्श की बात कही गई है। इस मामले में अगली सुनवाई 18 अप्रैल को होगी।
मालूम हो कि बिहार के राज्यपाल ने गत नौ फरवरी को छह कुलपतियों और दो प्रति कुलपतियों की नियुक्ति की थी। राज्यपाल ने पटना हाई कोर्ट के गत जनवरी के फैसले के बाद ये नियुक्तियां की थीं। राम तवक्या सिंह व बिहार सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दाखिल कर हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती दी है। जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने ये आदेश जारी किया।
न्यायमूर्ति जीएस सिंघवी की अध्यक्षता वाली पीठ ने सोमवार को कुलपतियों और प्रति कुलपतियों की नियुक्ति के आदेश पर अंतरिम रोक लगाते हुए कहा है कि विश्वविद्यालय के वरिष्ठतम डीन कुलपतियों का कामकाज देखेंगे। कोर्ट ने विश्वविद्यालय के चांसलर ऑफिस के रजिस्ट्रार को निर्देश दिया है कि वे नियुक्ति से संबंधित फाइलें व दस्तावेज सील बंद लिफाफे में सुप्रीम कोर्ट में दाखिल करें। साथ ही सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री से कहा है कि वह इस आदेश को फैक्स के ंजरिये रजिस्ट्रार चांसलर ऑफिस भेजे।
इससे पहले मामले पर सुनवाई के दौरान पीठ ने कुछ सख्त टिप्पणियां भी कीं। पीठ ने कहा कि नियुक्तियां पद की गरिमा के अनुरूप होनी चाहिए। दो नियुक्तियां तो राज्यपाल के स्थानांतरण आदेश के बाद की गई। पीठ ने कहा कि लगता है कि भ्रष्टाचार जीवनशैली का हिस्सा हो गया है। ये टिप्पणियां कोर्ट ने याचिकाकर्ता तवक्या सिंह व बिहार सरकार की ओर से पेश दलीलों को सुनने के बाद कीं। इससे पहले बिहार सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे ने पीठ को अखबार की कटिंग दिखाई जिसमें लिखा था कि नियुक्तियां स्थानांतरण आदेश के बाद भी हुई हैं। तवक्या सिंह के वकील ने कहा कि नियुक्तियों में तय प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया है। इसमें राज्य सरकार से परामर्श नहीं हुआ है। यह भी आरोप लगाया गया है कि जिन लोगों की नियुक्ति हुई है उन पर गंभीर आरोप लगे हैं।
कुलपतियों की ओर से पेश वकीलों ने अंतरिम आदेश का विरोध किया। उन्होंने कहा कि नियुक्तियां हाई कोर्ट के आदेश के अनुरूप हुई हैं। उनमें कोई खामी नहीं है। राज्यपाल को नियुक्ति करने का अधिकार है।
मालूम हो कि तवक्या सिंह ने पटना हाई कोर्ट में जनहित याचिका दाखिल कर कुलपति नियुक्तियों का मुद्दा उठाया था। जिसमें कहा गया था कि राज्यपाल राज्य सरकार से परामर्श के बगैर कुलपति की नियुक्ति नहीं कर सकते। हाई कोर्ट ने इस याचिका पर दिए गए आदेश में कहा कि राज्यपाल को नियुक्तियां करने का अधिकार है। हाई कोर्ट ने नियुक्तियों के संबंध में दिशानिर्देश भी तय कर दिए थे। बिहार सरकार ने याचिका दाखिल कर हाई कोर्ट के दिशानिर्देशों का विरोध किया है। राज्य सरकार का कहना है कि कुलपति की नियुक्तियों के बारे में तय हाई कोर्ट के दिशानिर्देश कानून के खिलाफ हैं। कानून में नियुक्तियों के बारे में राज्य सरकार से प्रभावी परामर्श की बात कही गई है। इस मामले में अगली सुनवाई 18 अप्रैल को होगी।