राजेश कानोडिया, नवगछिया।
एक समय वह भी था, जब देश के अन्य जगहों की तरह नवगछिया के भी मैदानी भागों तथा मकान की छतों पर से जम कर होती थी पतंगबाजी। जहां शोर भी मचाता था - अरे रे रे रे वो ---पटका और ----काटा । मगर अब समय और परिस्थिति के बदलते माहौल के साथ नवगछिया की पतंगबाजी लगभग गुम सी हो गयी है।
अब तो नवगछिया के गाँव देहात में कहीं कहीं कभी कभार नजर आती है पतंग । अब वहाँ भी नहीं होती पतंगबाजी । पहले एक खेल और शौक से होती थी पतंगबाजी । मगर इस अपराध मानसिकता वाले नवगछिया के क्षेत्र में लोगों को महज एक बहाना चाहिये। इसी बढ़ते अपराध की मानसिकता ने निगल लिया नवगछिया की पतंगबाजी को।
जहां पतंग की बड़ी बड़ी दर्जनों दुकाने सजती थी। जिसमें नए नए डिजाइन की बनी बनायी छोटी से लेकर बड़ी पतंग, कई साइज की लटेर और धागा के साथ साथ धागा का मंझा का सामान भी बिकता था। बच्चे से लेकर बड़े तक एक दूसरे की छत पर जा कर 'पतंग आकाश में, धागा मेरे पास में' का आनन्द उठाते थे। कुछ लोग पतंगों में संदेश लिख कर उड़ाते थे, तो कुछ लोग उसमें रुपये साट कर भी पतंग उड़ाते थे। जिसे लुटाने और लूटने का एक अलग ही आनन्द मिलता था।
अब भी गुजरात और देश के अन्य हिस्सों में जारी पतंगबाजी को देख नवगछिया के भी लोग सोच रहे हैं कि आखिर नवगछिया में फिर से कब लौटेंगे पतंगबाजी के वो दिन जब हम छू सकेंगे आसमान। जिसे लेकर आपस में नहीं होगा तनाव और नहीं होगा अपराध। या फिर हमारे मन की पतंगबाजी सिर्फ केला, कलाई और क्राइम के बीच ही मिट्टी में ही मिलती रहेगी।
