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लालूराज में 40 किलो दाना दिन भर में खा जाती थी मुर्गी!


लालू यादव चारा घोटाले के एक मामले में आज दोषी घोषित कर दिये गये. तीन अक्टूबर को विशेष सीबीआई अदालत ये फैसला सुनाएगी कि आखिर लालू को कितने साल की सजा होगी. कानून के जानकारों के बीच अटकलें इस बात की हैं कि लालू को तीन से सात साल के बीच की सजा हो सकती है. अटकलें एक तरफ, लेकिन अभियोजन और बचाव पक्ष को सुनने के बाद विशेष जज पीके सिंह सजा की अवधि का ऐलान करेंगे. इस बीच लालू न्यायिक हिरासत में भेज दिये गये हैं.
लालू को अदालत की तरफ से दोषी ठहराये जाने के साथ ही राजनीतिक विश्लेषकों ने उनके भविष्य का पोस्टमार्टम शुरु कर दिया है. कुछ ये मान कर चल रहे हैं कि लालू का सियासी कैरियर अब समाप्ति की ओर जाएगा, तो कुछ ये कयास लगाने में लगे हैं कि लालू का कोर वोट बैंक उन्हें छोड़कर कही नहीं जाएगा, बल्कि संकट की घड़ी में लालू के साथ भावनात्मक तौर पर और मजबूती से जुड़ेगा. बिहार की राजनीति से जुड़ी सभी पार्टियां भी अपने फायदे के हिसाब से लालू के दोषी ठहराये जाने के सियासी असर को समझाने में लगी है.
हालांकि इन विश्लेषणों और पूर्वानुमानों से ज्यादा रोचक इस घोटाले या फिर इसकी जांच से जुड़ी कहानियां हैं. दरअसल पशुपालन घोटाले की औपचारिक कहानी तो कोर्ट में पेश दस्तावेजों में दर्ज है. लेकिन इस कहानी का एक बड़ा हिस्सा कभी बाहर नहीं आया या आया भी तो ज्यादा लोगों का ध्यान नहीं गया. इस कहानी के कई पात्र ऐसे हैं, जो पूरे मामले को गहराई से जानते हैं, लेकिन अब भी सामने आने को तैयार नहीं हैं. इन्हीं सूत्रों के हवाले से पेश है इस कहानी के कुछ अनछुए, कुछ कम चर्चित पहलू, आखिर मौका भी है, दस्तूर भी है.
इंडियन एयरलाइंस की उड़ान और तीन करोड़ नकद की बरामदगी
एक फरवरी, 1993 का वो दिन था. तब देश के एविएशन सेक्टर में क्रांति नहीं आई थी. हवाई मुसाफिरी का प्रमुख साधन मोटे तौर पर सरकारी विमानन कंपनी इंडियन एयरलाइंस ही हुआ करती थी. रांची में आय कर विभाग से जुड़े अधिकारियों को एक खबरी से टिप मिली. टिप ये कि इंडियन एयरलाइंस की जो उड़ान कोलकाता से रांची, पटना और लखनऊ होते हुए दिल्ली तक जाती है, उससे भारी मात्रा में नकदी ले जाई जा रही है.
जब तक आयकर अधिकारी एयरपोर्ट पहुंचे, विमान रनवे की तरफ बढ़ना शुरु हो चुका था, अगले कुछ मिनटों में टेकऑफ हो जाने वाला था. विमान रुकवाकर आयकर अधिकारियों ने तलाशी का काम शुरु किया. पशुपालन विभाग के एक अधिकारी और एक ठेकेदार के पास से कुल मिलाकर तीन करोड़ रुपये की नकदी बरामद हुई और बड़े मात्रा में हीरे और सोने के गहने. आयकर अधिकारियों ने इसकी सूचना अपने वरिष्ठ अधिकारियों को दी और फिर ऑफिशियल चैनल से ये सूचना पहुंची राज्य सरकार के पास. लेकिन इस पर कार्रवाई करना तो दूर, आंख मूंद ली सरकार ने.
घोटाले का औपचारिक भंडाफोड़ होने में वीएस दुबे और अमित खरे की भूमिका
जनवरी 1996 का महीना था. बिहार की लालू यादव सरकार में वित्त आयुक्त थे वीएस दुबे. दुबे की छवि ईमानदार अधिकारी की थी. दुबे के पास राज्य के महालेखाकार कार्यालय की तरफ से पत्र आया, नवंबर और दिसंबर 1995 के दो महीनों में राज्य के पशुपालन विभाग की तरफ से आश्चर्यजनक तौर पर ज्यादा रकम की निकासी सरकारी खजाने से की गई थी. दुबे को इसमें गड़बड़झाले की बू आई.
राज्य के सभी जिला कलेक्टरों और उपायुक्तों को जनवरी महीने में दुबे ने मेमो लिखा और इस बारे में जांच करने का आदेश दिया. ज्यादातर अधिकारियों ने इस मेमो की अनदेखी की, लेकिन पश्चिम सिंहभूम जिले के तत्कालीन उपायुक्त अमित खरे ने इसे गंभीरता से लिया और जांच शुरु की. विभाग की कुछ ही फाइलों को पलटा, तो आंखें फट गई.
दिन भर में चालीस किलो दाना खा रही थी एक मुर्गी
अमित खरे के हाथ एक ऐसी फाइल लगी, जिसमें मौजूद दस्तावेज ये दिखा रहे थे कि चाइबासा के एक पशुपालन केंद्र की एक मुर्गी दिन भर में चालीस किलोग्राम चीकन फीड यानी दाना खा रही थी. खरे को ये देखकर चक्कर आ गया. आगे पन्ने पलटे तो पता चला कि उस एनिमल फार्म में दो हजार मुर्गियां दिखाई गई थीं और महज एक महीने में उन्हें इतना चारा खाता हुआ दिखाया गया था, जितना असल में वो अगले चालीस साल में खा सकती थीं.
खरे ने सरकारी लूट के इन सबूतों को देखने के बाद इस मामले में शिकायत दर्ज कराने का फैसला किया. पूरे पशुपालन घोटाले में जो करीब साठ से अधिक मामले अलग-अलग जिलों में दर्ज हुए, इसकी ये शुरुआत भर थी.
सौजन्य से - ब्रजेश कुमार सिंह, एडिटर (गुजरात)