यह मामला है राजस्थान का | जहां करौली-धौलपुर लोकसभा क्षेत्र से कांग्रेस
सांसद खिलाड़ीलाल बैरवा सांसद चुने जाने के चार साल बाद भी केरोसीन डीलर
बने हुए हैं। जबकि लोकसेवकों लिए ऐसा करना गैरकानूनी है।
लेकिन राजस्थान सरकार बैरवा पर मेहरबान है और आज तक उनका लाइसेंस रद्द नहीं किया गया है।
लेकिन राजस्थान सरकार बैरवा पर मेहरबान है और आज तक उनका लाइसेंस रद्द नहीं किया गया है।
करौली-धौलपुर
के लोकसभा सांसद खिलाड़ीलाल बैरवा की दिलचस्पी कानून बनवाने में माथापच्ची
करने में कम, कानून तोड़कर तेल बेचने में ज्यादा है। सासंद बनने के बावजूद
बैरवा करौली जिले के केरोसीन के थोक डीलर बने हुए हैं। जबकि चुने जाने के
बाद, 29 मई 2009 को जिला कलेक्टर ने उनके केरोसीन बेचने पर रोक लगा दी थी।
लेकिन चार साल से बैरवा अपना लाइसेंस बचाए हुए हैं।
सामाजिक कार्यकर्ता अशोक पाठक का कहना है कि सरकार की मिली भगत से बैरवा का लाईंसेस अभी तक रद्द नहीं हुआ है।
राजस्थान
के खाद्य एंव नागरिक आपूर्ति मंत्री ने जिला कलेक्टर की रोक को हटाते हुए
11 जून 2009 को, बैरवा को मौजूदा कार्यकाल तक तेल बेचते रहने की छूट दे दी,
वो भी बिना कोई वजह बताए। लेकिन विधि विभाग की राय के बाद 29 जून 2012 को
तेल बेचते रहने की छूट वापस ले ली गई। विधि विभाग ने साफ कहा कि लोक सेवक
सरकारी लाइसेंस नहीं रख सकता है।
खिलाड़ीलाल
बैरवा ने 10 दिसंबर 2012 को जिला कलेक्टर को पत्र लिखकर कहा कि राज्य
सरकार को रोक का हक नहीं, सासंद होने के नाते लोक सेवक का फैसला संसदीय
कार्य मंत्रालय करेगा। बैरवा के इस पत्र के बाद जिला कलेक्टर ने 13 दिसंबर
2012 को बैरवा का लाईसेंस फिर बहाल कर दिया।
सरकार की मेहरबानी से बैरवा जून 2009 से लेकर जनवरी 2013 तक 135.48 लाख लीटर नीला केरोसीन का कोटा उठा चुके।
खाद्य
एंव नागरिक आपूर्ति मंत्री परसादी लाल मीणा ने कहा कि मुझे इस मामले में
पता नहीं था। मैं बाहर था। सरकार ने उनका लाइसेंस बहाल नहीं किया है।
सांसद
बैरवा ने खुद माना है कि लोक सेवक के नाते वे डीलर नहीं रह सकते। लेकिन
उनका तर्क है कि उन्होंने पेट्रोलियम मंत्रालाय में छूट पाने के लिए अपील
की हुई है।
करौली-धौलपुर
के सांसद खिलाड़ीलाल बैरवा का कहना है कि अभी नियम बने है, उसके अनुसार
एजेंसी के लिए एमपी एप्लाई नहीं कर सकता। लेकिन साधारण आदमी क्या करेगा,
क्या गांरटी है कि एमपी कितने दिन रहूंगा, इस सेशन के बाद क्या होगा। ऐसे
में व्यापार तो परमानेंट है।
वैसे,
राजस्थान खाद्यान्न एंव आवश्यक पदार्थ 1976 कानून के खण्ड तीन के अनुसार
जनसेवक डीलर नहीं रह सकता। इतने साफ नियम के मुताबिक न तो बैरवा ने नैतिकता
और कानून की मर्यादा का पालन करते हुए डीलरशिप छोड़ी, न ही गहलोत सरकार ने
कानून का पालन कराने में दिलचस्पी दिखाई।
