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गुरुवार, 5 जनवरी 2017

नोटबंदी के बाद बर्बादी की कगार पर किसान

नईदिल्ली : नोटबंदी को दो महीने होने वाले हैं और मार्केट में कैश की सप्लाई भी पहले के मुकाबले बेहतर हो रही है, लेकिन नोटबंदी की सबसे ज्यादा मार
किसानों पर पड़ी है. आम जनता भले ही सस्ती सब्जी से खुश हो, लेकिन किसान अपनी लागत तक ना निकल पाने की वजह से परेशान हैं.
नोटबंदी से एक तो पहले से ही किसान की पैदावार नहीं बिक पा रही थी, ऊपर से अब नई फसल आने से दोहरी मुसीबत आ गई है. 'आज तक' की टीम दिल्ली की सबसे बड़ी थोक सब्जी मंडियों में से एक गाजीपुर सब्जी मंडी पहुंची. नोटबंदी के वक्त से सब्जियों की कीमत में आई गिरावट अब तक सामान्य नहीं हो पाई है. थोक दुकानदारों और किसानों ने बताया कि लागत से कम कीमत पर माल बेचना उनकी मजबूरी है.
आम तौर पर गाजीपुर सब्जी मंडी में सुबह ही लेन-देन का सिलसिला शुरू हो जाता है. किसान दिन चढ़ते ही व्यापारियों को सब्जियां बेचकर निकल जाते हैं, जबकि अब दोपहर तक किसान अपनी सब्जियां व्यापारियों को बेचने की कोशिश में ही लगे नजर आ रहे थें. व्यापारियों का कहना है कि पहले से ही सब्जियों का स्टॉक पड़ा हुआ है और ऊपर से नई फसल आने से मुसीबत और बढ़ गई है. आलम ये है कि माल ज्यादा है और खरीददार कम हैं. यही वजह है कि किसान मजबूरी में बेहद कम कीमत में अपनी पैदावार बेच के जा रहे हैं.
दिल्ली की गाजीपुर मंडी में सब्जियों की थोक कीमतें कुछ इस तरह हैं.
आलू: 4-5 रुपये किलो
गोभी: 2-3 रुपये किलो
टमाटर: 5-7 रुपये किलो
मिर्च: 20 रुपये किलो
प्याज: 10-12 रुपए किलो
मटर: 7 रुपये किलो
गाजर: 7 रुपये किलो
गोभी थोक में 30 किलो की थैली 90 रुपये में मंडी में बिक रही है, जबकि किसान को 15-20 रुपये प्रति तीस किलो मिल रहा है. दरअसल इसमें अधिकतर सब्जियों की नई फसलें आ गई हैं. ऐसे में सब्जियों के दाम अभी भी नीचे गिरे हुए हैं.
सब्जी व्यापारी कह रहे हैं कि इतना नुकसान कभी नहीं हुआ. किसानों को ना तो उनकी पैदावार की लागत मिल पा रही है और ना ही व्यापारियों की आमतौर में होने वाली बिक्री हो पा रही है. आम जनता सब्जियों की कम कीमत से खुश है, जबकि किसान बर्बादी की कगार पर है.

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