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एक गांव जहां प्रियजनों की याद में लोग करते हैं पौधारोपण

प्रियजनों को पौधों में जीवित रखने की है आस्था

अंतिम संस्कार के बाद शमशान के समीप स्मृति में रोपेते हैं पौधे

अनुकरणीय कदम : राजेश कानोडिया
बिहार के नवगछिया अनुमंडल अन्तर्गत धरहरा गांव में जहां एक ओर बेटी के जन्म पर फलदार पौधों का रोपण कर पर्यावरण संरक्षण की मिशाल वर्षों से जारी है। जहां लगातार तीन वर्षों से बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी आकर पौधारोपण कर रहे हैं। वहीं दुसरी ओर शुक्लापुर गांव में भी प्रियजनों के अंतिम संस्कार के बाद उनके जीवन को सहेजे रखने के लिये लोगों द्वारा
पौधा रोपण किया जाता है। यह भी धरहरा की तरह अपने आप में एक अनूठी मिशाल है। जो सभी गांवों के लिये एक अनुकरणीय कदम है। जिसके लिये सभी राज्य सरकारों को इस योजना को प्रोत्साहित  कराना चाहिये।
क्या है यह आस्था
देहरादून स्थित शुक्लापुर गांव के लोगों की पुनर्जन्म में अटूट आस्था है। पुनर्जन्म को विज्ञान भले ही संशय की निगाह से देखता हो। इस आस्था के लिए उन्होंने पौधों में ही आधार को तलाशा। जो  मृत्यु के बाद जीवन को सहेजने की एक अनूठी विधा है । जो पर्यावरण को भी सेहतमंद बनाती है।
इस आस्था और विश्वास के तहत अपने प्रियजन की मृत्यु पर अंतिम संस्कार के पश्चात गांव के लोग शमशान घाट में एक पौधा रोपते हैं। चिता की राख वहीं डाली जाती है। ग्रामीण उसी पौधे में अपने प्रिय को देखते हुए उसकी देखभाल भी करते हैं। सवा साल पहले शुरू हुई इस परंपरा के फलस्वरूप अब तक 23 लोग अपने इस नये अवतार के रूप में यहां मौजूद हैं।
कहां है शुक्लापुर गांव
उत्तराखंड की राजधानी देहरादून से करीब 16 किलोमीटर दूर है शुक्लापुर गांव। यहीं पर छोटी आसन नदी के किनारे स्थित है एक शमशान घाट। नाम दिया गया है पुनर्जन्म। शुक्लापुर और अंबीवाला गांवों के लोग यहीं अंतिम संस्कार करते हैं। शुक्लापुर निवासी राकेश सेमवाल बताते हैं पिछले वर्ष 22 दिसंबर को मैंने अपने पिता की याद में यहां आंवले का पौधा रोपा। मैं यहां सुबह-शाम दोनों वक्त आता हूं।
वह कहते हैं यहां आकर मुझे लगता है जैसे मेरे पिता मेरे पास ही हैं। पौधे की देखभाल करना मेरी दिनचर्या का हिस्सा है। ये अकेले राकेश की दिनचर्या नहीं, शुक्लापुर और अंबीवाला गांव के कई परिवारों की कहानी है।
इस परंपरा के जनक
दरअसल, इस परंपरा के जनक हैं हिमालयी पर्यावरण अध्ययन एवं संरक्षण संस्था (हेस्को) के संस्थापक पद्मश्री डा. अनिल प्रकाश जोशी। डॉ. जोशी तकरीबन 25 साल से हिमालयी क्षेत्रों में पर्यावरण संरक्षण की अलख जगा रहे हैं। डॉ. जोशी कहते हैं जब तक पर्यावरण को आम आदमी से नहीं जोड़ा जाएगा, तब तक सारी कवायद बेकार हैं।