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ढाई आखर प्रेम का, है बड़ा संसार, आज हो सिर्फ प्यार, प्यार और प्यार

ढाई आखर प्रेम का, है बड़ा संसार | चुनौती भरी ललकार है- आज हो सिर्फ प्यार, प्यार और प्यार |
भले ही आजकल रा-वन, रेस-टू, मर्डर-थ्री सरीखी संख्या सूचक फिल्में बनने लगी हों, लेकिन एक वक्त वो भी था, जब ‘प्यार’ शीर्षक से पर्याप्त फिल्में परोसी जाती थीं। भूलवश एक बार अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा जरूर आ गया, वरना हिंदी फिल्म निर्माताओं ने जब प्यार किसी से होता है, प्यार ही प्यार, अमर प्रेम, प्यार किया तो डरना क्या  से लेकर
कहो न प्यार है  इत्यादि में सिर्फ प्यार करने के लिए तीन घंटे की लीला कराई।
पता नहीं क्यों, बिमल दा के फ्रस्टेटेड देवदास ने पारो को हासिल न कर पाने के कारण ‘वो शादी के रास्ते चली गई और मैं बर्बादी के..’ बुदबुदाते हुए इहलीला समाप्त कर दी। लेकिन शोले  का वीरू चढ़ गया पानी की टंकी पर- मौसी के साथ-साथ गांव वालों को भी राजी करके ही माना। हमारे यहां तो हम आपके हैं कौन पूछते-पूछते ही दिलवाले दुल्हनिया ले आते हैं। ऐतिहासिक बैकग्राउंड पर के आसिफ ने बनाई थी मुगले आजम।  भरे दरबार में शास्त्रीय शैली में चुनौती- प्यार किया तो डरना क्या़..।  ये बोल आज भी डरपोक प्रेमियों को नैतिक बल प्रदान करते हैं।
प्यार की चर्चा में संतों का स्मरण सहज है, कबीर ने तो उसी को पंडित माना, जिसने प्रेम का ढाई आखर पढ़ा हो। प्रेम की पवित्रता की रक्षा करने वाला सूत्र भी एक भारतीय संत तुलसीदास की ही देन है- जापर जांकों सत्य सनेहू़, सो तेहि मिलै न कछु संदेहू।  अब एक विदेशी संत की अनुकंपा से बाजार में पसर गया है प्यार। भले ही इस बीच प्यार का सिलेबस बदल गया है। छज्जे वाली ताका-झांकी, किताबों के बहाने खतों की आवाजाही अब बीते युग की दिल्लगी हैं। अब यह सब ऑनलाइन है ट्विटर और फेसबुक पर। अस्त-व्यस्त जिंदगी में हर रोज मस्त नहीं रहा जा सकता। लिहाजा फरवरी की 14वीं तारीख फिक्स घोषित हो गया वैलेंटाइन डे। बोले तो प्रणय चतुर्दशी यानि प्रेम दिवस ।
मामूली-सा गुलाब भी इसी दिन अपना ‘भाव’ दिखाता है। भावना नेपथ्य में उपहार मुखर होता है । अब प्यार अंधा नहीं होता। खुली आंखों वाले आज के प्रेमी कैलकुलेटिव हैं। मिनरल वाटर की तरह पवित्र-प्यार, जिसमें पेप्सी-कोक की शीतलता पिज्जा-बर्गर की तृप्ति और चुनौती भरी ललकार है- कहो ना प्यार है..कहो ना प्यार है..।
दरअसल एक अहसास का नाम है प्यार। अहसास है तो प्यार है और प्यार है तो रिश्ते चाहे वह प्रेमी-प्रेमिका का हो, पति-पत्नी का हो, भाई-बहन का हो, मां-बेटे का हो या फिर पिता-पुत्री का हो, भूमंडलीकरण के दौर में भी उसे जिंदा रखा जा सकता है।
जब से भूमंडलीकरण हुआ है कि प्यार ने भी वस्तु का रूप ले लिया है। पहले प्यार के इजहार के लिए सिर्फ एक-दूसरे के भावनाओं को देखा जाता था। पर अब उसका स्थान जेब ने ले लिया है। फलस्वरूप प्रेम का धागा अधिक टिकाऊ नहीं हो पाता है। सच्चे प्रेम में एक दूसरे के प्रति त्याग और समर्पण बहुत जरूरी है जो ताउम्र एक-दूसरे को जोड़े रखता है। रिश्तों को प्रगाढ़ बनाने के लिए एक-दूसरे को अपनी बुद्धि और वफादारी का सबूत देना चाहिए। प्रेम जब सिर्फ शारीरिक आकर्षण होता है तो वहां बेवफाई का डर बना रहता है लेकिन जिस प्रेम में दिल और दिमाग दोनों शामिल हों वह आसानी से नहीं टूटता है। समझदारी, वफादारी, ईमानदारी, भलाई और समर्पण से भरे रिश्ते आसानी से ना तो तोड़े जा सकते हैं और ना ही भुलाए जा सकते हैं।
प्यार सिर्फ प्रेमी-प्रेमिका के बीच नहीं होता है। प्यार का दायरा बहुत बड़ा है। हर रिश्तों को प्यार ही मजबूती प्रदान करता है। पति-पत्नी, माता-पिता, भाई-बहन, पिता-पुत्र, पिता-पुत्री, गुरू-शिष्य, यानी हर तरह के संबधों में प्यार बहुत मायने रखता है। दफ्तर, सार्वजनिक स्थानों पर भी अगर आप किसी से प्यार से पेश आएंगे तो आपको उसका लाभ मिलेगा। इतना ही नहीं जनवर भी प्यार की भाषा समझते हैं।
वैलेंटाइन डे मनाइए, अवश्य मनाइए, धूमधाम से मनाइए, पर भौतिकता को नजरंदाज कर मानवीय संवेदनाओं को ज्यादा तरजीह दीजिए। तब इससे परिवार में, समाज में संवेदना और मानवता बढ़ेगी। इससे लोगों को प्रेम की गहराई और गरिमा को पहचाने का अवसर मिलेगा। जिससे अपराध, हिंसा और महिलाओं के प्रति अत्याचार, बलात्कार जैसी घटनाओं पर स्वतः अकुंश लगेगा।