ग्रामीण इलाकों में कार्यरत स्वयं सहायता समूहों [एसएचजी] को बैंक अब
ज्यादा कर्ज देने को तैयार हो गए हैं। ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने
इस बारे में वित्त मंत्री पी चिदंबरम पर जो दबाव बनाया था उसका सकारात्मक
परिणाम निकलता दिख रहा है। चिदंबरम ने बैंकों को सख्त निर्देश दिए हैं कि
वे एसएचजी को कर्ज देने में कोई कोताही न बरतें।
सरकारी बैंकों के प्रमुखों के साथ गुरुवार को वित्त मंत्री की बैठक में रमेश भी शामिल थे। सूत्रों के मुताबिक वित्त मंत्री ने साफ तौर पर बैंकों को कहा कि वे स्वयं सहायता समूहों को कर्ज देने की अपनी नीति में व्यापक बदलाव लाएं। आंकड़े बताते हैं कि पूरे देश में एसएचजी को जितने कर्ज बैंक देते हैं उसका 80 फीसद हिस्सा दक्षिण भारत के सिर्फ चार राज्यों आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक व केरल को दिया जा रहा है। चिदंबरम ने बैंकों से इस विसंगति को चालू वित्त वर्ष में ही दूर करने को कहा है।
सूत्रों के मुताबिक एसएचजी को कर्ज वितरित करने को लेकर कई अहम मुद्दों पर सहमति बन गई है। एसएचजी को मिलने वाले कर्ज की निगरानी के लिए हर बैंक में एक उप-समिति का गठन किया जाएगा। निगरानी मुख्य तौर पर इस बात की जाएगी कि गैर दक्षिणी राज्यों के स्वयं सहायता समूहों को भी कर्ज मिले। इस कवायद का उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश सहित तमाम उत्तर भारत के राज्यों को फायदा होगा। ग्रामीण विकास मंत्रालय की तरफ से वित्त मंत्रालय को एक सूची सौंपी गई है जिसमें यह बताया गया है कि
राज्यवार एसएचजी को कितना कर्ज दिया जाना चाहिए।
बताते चलें कि एसएचजी ऐसे लोगों का समूह होता है तो वित्तीय संस्थानों से कर्ज ले कर छोटा-मोटा व्यवसाय करते हैं। यह व्यवसाय समूह के लोगों के लिए जीवकोपार्जन का एक बेहतरीन जरिया होता है। पिछले वर्ष बैंकों ने इन समूहों को 15,943 करोड़ रुपये का कर्ज दिया जिसमें 12,588 करोड़ रुपये उक्त चार दक्षिण भारतीय राज्यों में पंजीकृत एसएचजी को मिला। बिहार के एसएचजी को महज इसका 2.5 फीसद, उत्तर प्रदेश को 2.8 फीसद, राजस्थान को 1.1 फीसद कर्ज मिला है। वित्त मंत्री का नया निर्देश इस भेदभाव को खत्म कर सकता है।
ग्रामीण विकास मंत्रालय की तरफ से वित्त मंत्रालय को देश के तमाम राज्यों में एसएचजी को कर्ज की जरूरत को लेकर भी एक रिपोर्ट सौंपी गई है। इसमें कहा गया है कि चालू वित्त वर्ष के दौरान बिहार के एसएचजी को मिलने वाले कर्ज में 172 फीसद, उत्तर प्रदेश के एसएचजी को 301 फीसद, मध्य प्रदेश के एसएचजी को 954 फीसद, झारखंड में 235 फीसद की वृद्धि होनी चाहिए। अब देखना होगा कि वित्त मंत्री के सख्त निर्देश का पालन कहां तक होता है।
वे एसएचजी को कर्ज देने में कोई कोताही न बरतें।
सरकारी बैंकों के प्रमुखों के साथ गुरुवार को वित्त मंत्री की बैठक में रमेश भी शामिल थे। सूत्रों के मुताबिक वित्त मंत्री ने साफ तौर पर बैंकों को कहा कि वे स्वयं सहायता समूहों को कर्ज देने की अपनी नीति में व्यापक बदलाव लाएं। आंकड़े बताते हैं कि पूरे देश में एसएचजी को जितने कर्ज बैंक देते हैं उसका 80 फीसद हिस्सा दक्षिण भारत के सिर्फ चार राज्यों आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक व केरल को दिया जा रहा है। चिदंबरम ने बैंकों से इस विसंगति को चालू वित्त वर्ष में ही दूर करने को कहा है।
सूत्रों के मुताबिक एसएचजी को कर्ज वितरित करने को लेकर कई अहम मुद्दों पर सहमति बन गई है। एसएचजी को मिलने वाले कर्ज की निगरानी के लिए हर बैंक में एक उप-समिति का गठन किया जाएगा। निगरानी मुख्य तौर पर इस बात की जाएगी कि गैर दक्षिणी राज्यों के स्वयं सहायता समूहों को भी कर्ज मिले। इस कवायद का उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश सहित तमाम उत्तर भारत के राज्यों को फायदा होगा। ग्रामीण विकास मंत्रालय की तरफ से वित्त मंत्रालय को एक सूची सौंपी गई है जिसमें यह बताया गया है कि
राज्यवार एसएचजी को कितना कर्ज दिया जाना चाहिए।
बताते चलें कि एसएचजी ऐसे लोगों का समूह होता है तो वित्तीय संस्थानों से कर्ज ले कर छोटा-मोटा व्यवसाय करते हैं। यह व्यवसाय समूह के लोगों के लिए जीवकोपार्जन का एक बेहतरीन जरिया होता है। पिछले वर्ष बैंकों ने इन समूहों को 15,943 करोड़ रुपये का कर्ज दिया जिसमें 12,588 करोड़ रुपये उक्त चार दक्षिण भारतीय राज्यों में पंजीकृत एसएचजी को मिला। बिहार के एसएचजी को महज इसका 2.5 फीसद, उत्तर प्रदेश को 2.8 फीसद, राजस्थान को 1.1 फीसद कर्ज मिला है। वित्त मंत्री का नया निर्देश इस भेदभाव को खत्म कर सकता है।
ग्रामीण विकास मंत्रालय की तरफ से वित्त मंत्रालय को देश के तमाम राज्यों में एसएचजी को कर्ज की जरूरत को लेकर भी एक रिपोर्ट सौंपी गई है। इसमें कहा गया है कि चालू वित्त वर्ष के दौरान बिहार के एसएचजी को मिलने वाले कर्ज में 172 फीसद, उत्तर प्रदेश के एसएचजी को 301 फीसद, मध्य प्रदेश के एसएचजी को 954 फीसद, झारखंड में 235 फीसद की वृद्धि होनी चाहिए। अब देखना होगा कि वित्त मंत्री के सख्त निर्देश का पालन कहां तक होता है।