इन दिनों नवगछिया के गांवों की गलियों से लेकर शहर तक जल्दी-जल्दी ऊग हे सूरुज देव..., कइलीं बरतिया तोहार हे छठ मइया..., कवने दिन उगी छई हे दीनानाथ... जैसे पारंपरिक गीत गूंजने लगे हैं। इसी के साथ ही छठ पूजा का माहौल भी बनने लगा है। इन गीतों से छठ पूजा का विधि-विधान और पारंपरिक कथाएं जुड़ी हैं। इन गीतों में आराध्य देव सूर्य की महिमा का गुणगान भी होता है।
गीतों में परंपरा की महक है :
कोसी गंगा फिल्म्स के निर्माता व निदेशक नरेंद्र गुलशन कहते हैं, हम चार महान देवताओं माता, पिता, गुरु और सूर्य का साक्षात दर्शन करते हैं। छठ पूजा के समय हम ब्रह्म मुहूर्त में बिस्तर छोड़ देते हैं। यह विलासिता का त्याग है। इसके साथ ही सूर्य की असंख्य किरणें ऊर्जा के रूप में हममें समाहित होती हैं। इस लिहाज से भी छठ पर्व लोकप्रिय हो रहा है। छठ पूजा पर गीतों की महिमा पर रोशनी डालते हुए उन्होंने कहा कि 'आठ ही काठ के ओठरिया है दीनानाथ...' जैसे गीतों में परंपरा की महक है।
भक्ति भाव में गुजर जाते हैं चार दिन :
नृत्य संगीत निदेशक निभाष मोदी कहते हैं बचपन से ही छठ पूजा देख रहे हैं। मां भी छठ पूजा करती हैं। उनका कहना है कि छठ के गीत सीडी और कैसेट में बजने के साथ ही लगता है, छठ पूजा शुरू हो गई है। इसके साथ ही छठ पूजा की सारी बातें नजर के सामने घूम जाती हैं। नहाय-खाय से इस व्रत की शुरुआत होती है और चौथे दिन सुबह उगते सूर्य देव को अर्घ्य देने पर व्रत की समाप्ति होती है। इन दिनों छठ मइया के गीत गाए, बजाए जाते हैं। भक्ति-भाव और उपासना के साथ ये चार दिन कैसे गुजर जाते हैं, पता ही नहीं चलता है।
नवगछिया के प्रमुख कलाकार राजेन्द्र भगत कहते हैं, पारंपरिक गीत में छठ पूजा का मर्म छिपा है। यही वजह है कि इन गीतों के सुनते ही मन में छठ पूजा का संपूर्ण चित्रण हो जाता है। इन गीतों में व्रत की महिमा और परंपरा की गाथाएं हैं। इस व्रत में तीन दिन व्रती उपवास करते हैं, फिर उनमें ऊर्जा और स्फूर्ति कायम रहती है। इससे छठ पूजा की महिमा का अंदाजा लगाया जा सकता है। वह कहती हैं कि इस पर्व में सबसे बड़ी बात है आराध्य देव से रूबरू होना। उनसे हमें ऊर्जा और ज्ञान प्राप्त होता है।
